Bhagwat Geeta, Chapter 1, Shlok 6
श्लोक:
"एतां विशालां महाश्चर्यां कौरवाणि केशव,
युद्धशास्त्रं प्रवृत्तं हि शत्रुं साधनं प्रतिसद्धय।"
अनुवाद:
"हे केशव, देखो यह विशाल और शक्तिशाली कौरवों की सेना, जो युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार है, और यह महा युद्ध होने वाला है।"
श्लोक का पृष्ठभूमि:
यह श्लोक भगवद गीता के पहले अध्याय से है, जहाँ कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि पर भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद हो रहा है। युद्ध शुरू होने से पहले अर्जुन, जो एक महान योद्धा हैं, अपने सामने कौरवों की विशाल और सुसज्जित सेना को देख रहे हैं। जैसे ही वह सेना को देखता है, वह दुःख, संदेह और भ्रम से भर जाता है, क्योंकि उसके सामने रिश्तेदार, गुरु, और प्रियजन भी युद्ध के लिए खड़े हैं।
इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण से कह रहा है कि वह कौरवों की विशाल और शक्तिशाली सेना को देखे, जो युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार है। अर्जुन को युद्ध की इस स्थिति का सामना करना कठिन लग रहा है, क्योंकि वह अपने प्रियजनों से लड़ा नहीं सकता।
श्लोक का विश्लेषण:
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"एतां विशालां महाश्चर्यां":
- यहाँ अर्जुन कौरवों की सेना को "विशाल" और "महाश्चर्य" (अत्यधिक शक्तिशाली) के रूप में देखता है। वह सेना के आकार और उसकी शक्ति को देखकर विस्मित है।
- "विशालां" का अर्थ है "विशाल" और "महाश्चर्यां" का अर्थ है "अत्यधिक शक्तिशाली" या "प्रचंड शक्ति वाली।"
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"कौरवाणि केशव":
- अर्जुन यहाँ भगवान कृष्ण को केशव (कृष्ण का एक नाम) के रूप में संबोधित कर रहा है।
- "कौरवाणि" का अर्थ है "कौरवों की सेना," और "केशव" भगवान कृष्ण का नाम है।
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"युद्धशास्त्रं प्रवृत्तं हि":
- इस भाग का अर्थ है "यह युद्ध अब शुरू हो चुका है।" अर्जुन यह बता रहा है कि युद्ध का समय आ गया है, यह अब केवल योजना नहीं, बल्कि एक वास्तविकता बन चुका है।
- "युद्धशास्त्रं" का अर्थ है "युद्ध की कला" या "युद्ध की तैयारी," और "प्रवृत्तं" का अर्थ है "शुरू हो चुका है"।
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"शत्रुं साधनं प्रतिसद्धय":
- यहाँ अर्जुन कौरवों की तैयारियों को "शत्रु का साधन" कहकर देखता है। वह यह मानता है कि कौरवों ने युद्ध की पूरी तैयारी कर ली है और वे युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार हैं।
- "शत्रुं साधनं" का अर्थ है "शत्रु की तैयारियाँ" और "प्रतिसद्धय" का अर्थ है "युद्ध के लिए तैयार।"
शास्त्र के पीछे का दर्शन:
इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन यह महसूस कर रहा है कि वह अपने रिश्तेदारों और प्रियजनों से युद्ध करने के लिए मजबूर है। वह देख रहा है कि कौरवों की सेना अत्यधिक विशाल और शक्तिशाली है, और यह युद्ध एक महत्वपूर्ण और निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुका है। अर्जुन का मानसिक संघर्ष केवल शारीरिक युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मिक और भावनात्मक द्वंद्व है।
यह श्लोक हमें यह बताता है:
- स्थिति की वास्तविकता: अर्जुन यह स्वीकार करता है कि युद्ध अब अनिवार्य हो चुका है। कौरवों की सेना पूरी तरह तैयार है, और युद्ध को अब टाला नहीं जा सकता।
- धर्म (कर्तव्य) और भावनाओं के बीच संघर्ष: अर्जुन अपने कर्तव्यों और अपनी भावनाओं के बीच उलझा हुआ है। वह अपने रिश्तेदारों, गुरुजन और प्रियजनों के साथ युद्ध करने के विचार से व्यथित है।
- आंतरिक संघर्ष: अर्जुन का संघर्ष केवल बाहरी युद्ध का नहीं है, बल्कि यह अंदरूनी मानसिक और भावनात्मक द्वंद्व है, जो उसे अपने कर्तव्यों के निर्वाह में कठिनाई पैदा कर रहा है।
कहानी के रूप में:
कल्पना कीजिए कि आप एक बड़े युद्ध के मैदान पर खड़े हैं। सामने दुश्मन की विशाल सेना खड़ी है, और उनमें आपके प्रियजन, रिश्तेदार और शिक्षक भी शामिल हैं। आप जानते हैं कि आपको युद्ध करना है, लेकिन आपका दिल आपके दोस्तों और परिवार वालों से लड़ने का नहीं चाहता। आप सोचते हैं, "मैं कैसे इन लोगों से लड़ सकता हूँ? ये वही लोग हैं जिन्होंने मुझे बचपन में सिखाया, जिनके साथ मैंने समय बिताया।"
आप अपने गुरु से पूछते हैं, "गुरुजी, ये क्या हो रहा है? कैसे मैं इनसे लड़ सकता हूँ, जो मेरे इतने करीब हैं?" गुरु मुस्कराते हुए कहते हैं, "यह युद्ध केवल एक शारीरिक लड़ाई नहीं है। यह तुम्हारे भीतर का संघर्ष है, जहाँ तुम्हें अपने कर्तव्य का पालन करना है, चाहे वह कितना भी कठिन क्यों न हो। यह समय तुम्हारा कर्तव्य निभाने का है, न कि भावनाओं के अनुसार चलने का।"
इसी प्रकार, कृष्ण अर्जुन को यह समझाते हैं कि जीवन में कई बार हमें अपने कर्तव्यों को निभाना पड़ता है, भले ही हमारे व्यक्तिगत संबंध और भावनाएँ संघर्ष में हों।
निष्कर्ष:
इस श्लोक में अर्जुन कौरवों की विशाल और शक्तिशाली सेना को देखकर युद्ध के लिए अपनी तैयारियों को महसूस कर रहा है। वह भावनात्मक रूप से परेशान है, क्योंकि युद्ध में उसे अपने प्रियजनों के खिलाफ खड़ा होना है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि जीवन में कई बार हमें अपने कर्तव्यों के लिए कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं, जो भावनात्मक रूप से कठिन हो सकते हैं। अर्जुन की यह आंतरिक उलझन इस गीता के शिक्षाओं की शुरुआत है, जहाँ कृष्ण उसे अपने कर्तव्यों का पालन करने की राह दिखाएंगे।
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