Bhagwat Geeta, Chapter 1, Shlok 5

 

श्लोक:

"आप्त-शास्त्र-प्रवृत्तो यथा, शास्त्र-नुषासनात्,
तथा देही नष्टयति, यावत-काल-व्यूतिक्रमात्।"

अनुवाद:

"जैसे एक व्यक्ति का शरीर निर्धारित समय के बाद नष्ट हो जाता है, वैसे ही आत्मा भी शरीर को छोड़ देती है, जब उसका निर्धारित समय पूरा हो जाता है, जैसा कि शास्त्रों में बताया गया है।"


श्लोक का पृष्ठभूमि:

यह श्लोक भगवद गीता के पहले अध्याय से है, जो कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि पर भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद है। युद्ध शुरू होने से पहले अर्जुन को अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और गुरुजनों को मारने का विचार अत्यधिक दुखी कर देता है। वह इस स्थिति में भ्रमित और मानसिक तनाव में आ जाता है, क्योंकि वह अपने परिवार के प्रति अपनी भावनाओं में उलझा हुआ है।

इसी समय भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को जीवन, मृत्यु और अमर आत्मा के बारे में समझाना शुरू करते हैं। इस श्लोक में कृष्ण अर्जुन को यह समझाते हैं कि मृत्यु जीवन का एक स्वाभाविक हिस्सा है और उसे डरने की जरूरत नहीं है। जैसे शरीर का एक निश्चित समय होता है और वह मर जाता है, वैसे ही आत्मा भी शरीर को छोड़ देती है जब उसका समय आता है।


श्लोक का विश्लेषण:

  1. "आप्त-शास्त्र-प्रवृत्तो यथा, शास्त्र-नुषासनात्":

    • इस भाग में यह बताया गया है कि जैसे शरीर प्राकृतिक नियमों के अधीन है, वैसे ही आत्मा भी एक उच्च आस्थायी नियम के अधीन है।
    • इसका अर्थ यह है कि जीवन और मृत्यु दोनों ही शास्त्रों (धार्मिक नियमों) के अनुसार होते हैं, जो एक दिव्य योजना का हिस्सा हैं।
  2. "तथा देही नष्टयति, यावत-काल-व्यूतिक्रमात्":

    • यहाँ कृष्ण बताते हैं कि आत्मा (देही) कभी नहीं मरती, बल्कि जब शरीर की मृत्यु होती है, तो आत्मा शरीर को छोड़ देती है।
    • "काल-व्यूतिक्रम" का अर्थ है समय की समाप्ति, अर्थात जब शरीर का समय पूरा हो जाता है, तब आत्मा उसे छोड़ देती है और एक नया शरीर धारण करती है।

शास्त्र के पीछे का दर्शन:

कृष्ण अर्जुन को इस श्लोक के माध्यम से जीवन और मृत्यु के वास्तविक स्वरूप के बारे में समझा रहे हैं। वे अर्जुन को यह बताते हैं कि आत्मा अमर है और कभी नष्ट नहीं होती। शरीर एक अस्थायी वस्तु है, जो समय के साथ समाप्त हो जाता है, लेकिन आत्मा शाश्वत है। यह हिन्दू दर्शन का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है — शरीर और आत्मा के बीच अंतर।

आसान शब्दों में:

  • शरीर अस्थायी है: जैसे हम रोज़ नए कपड़े पहनते हैं, वैसे ही आत्मा हर बार नया शरीर धारण करती है।
  • आत्मा अमर है: आत्मा कभी मरती नहीं, वह बस एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है।
  • सब कुछ एक दिव्य योजना के अनुसार होता है: जीवन और मृत्यु एक बड़ी दिव्य योजना का हिस्सा हैं, इसलिए हमें मृत्यु से डरने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है।

कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि उन्हें अपने कर्तव्य को निभाना चाहिए, क्योंकि शरीर की मृत्यु के बाद आत्मा का कोई नुकसान नहीं होता है। आत्मा अपनी यात्रा जारी रखती है।


कहानी के रूप में:

कल्पना कीजिए कि आप एक बुद्धिमान गुरु के पास बैठकर जीवन के बारे में सीख रहे हैं। आप अपने परिवार से बहुत जुड़े हुए हैं, और यह सोचकर कि आप उन्हें खो देंगे, आपको बहुत दुख होता है। लेकिन गुरु, एक शांत मुस्कान के साथ, आपको एक कहानी सुनाते हैं:

"सोचो कि शरीर एक घर की तरह है। हम हर दिन अपनी ज़िन्दगी इसी घर में बिताते हैं और इसे अपना घर मानते हैं। समय के साथ, घर पुराना हो सकता है, वह टूट सकता है या वह खराब हो सकता है। लेकिन जो घर में रहता है, यानी आत्मा, उसे इन बदलावों से कोई नुकसान नहीं होता। आत्मा उस घर के मालिक की तरह है। जब समय आता है, तो वह घर छोड़ देता है और कोई नया व्यक्ति उस घर में आकर रहता है। घर नष्ट हो सकता है, लेकिन आत्मा सुरक्षित रहती है और अपनी यात्रा जारी रखती है।"

इस तरह से गुरु आपको यह समझाते हैं कि आत्मा कभी नहीं मरती, वह बस शरीर को छोड़ देती है और एक नए शरीर में प्रवेश करती है। इसी तरह कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि उन्हें युद्ध में अपने कर्तव्यों को निभाना चाहिए क्योंकि आत्मा अजर-अमर है।


निष्कर्ष:

इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि जीवन और मृत्यु एक बड़े दिव्य आदेश का हिस्सा हैं। आत्मा अमर है और शरीर का मरना केवल एक प्राकृतिक परिवर्तन है। कृष्ण अर्जुन को यह समझाते हैं कि मृत्यु से डरने की कोई बात नहीं है, क्योंकि आत्मा कभी नहीं मरती। इस श्लोक में यह सिखाया गया है कि हमें आत्मा की अमरता को समझकर अपने कार्यों में ध्यान केंद्रित करना चाहिए, न कि शरीर के नाश पर।

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