Bhagwat Geeta, Chapter 1, Shlok 4


श्लोक:

सञ्जय उवाच |
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा |
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत् || 1-4 ||

सरल अनुवाद:

सञ्जय ने कहा:
जब दुर्योधन ने पाण्डवों की सेना को युद्ध के लिए व्यवस्थित रूप में देखा, तो वह तुरंत अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास गया और उनसे यह शब्द कहे:

श्लोक की कहानी:

यह श्लोक भगवद गीता के पहले अध्याय का एक भाग है, जो कुरुक्षेत्र के युद्ध भूमि पर है। यहाँ पाण्डव और कौरवों के बीच भयंकर युद्ध होने वाला है।

  • दुर्योधन कौन है?
    दुर्योधन कौरवों का सबसे बड़ा बेटा है, और वह सोचता है कि हस्तिनापुर की गद्दी उसी के लिए है। लेकिन पाण्डवों को भी उसी गद्दी का हक़ है। इस कारण दोनों पक्षों के बीच संघर्ष बढ़ता है और युद्ध की स्थिति बनती है।

  • सञ्जय कौन है?
    सञ्जय धृतराष्ट्र के सलाहकार हैं, जो अंधे हैं। वे कुरुक्षेत्र में हो रही घटनाओं का वर्णन धृतराष्ट्र से करते हैं।

  • दुर्योधन क्यों द्रोणाचार्य से बात करता है?
    जब दुर्योधन ने पाण्डवों की सेना को युद्ध में संगठित देखा, तो वह घबराता है। पाण्डवों का सेना का रूप देखकर उसे चिंता होती है कि वह युद्ध जीतने में मुश्किल महसूस करता है। इसलिए वह द्रोणाचार्य से सलाह लेने जाता है, क्योंकि द्रोणाचार्य उसके गुरु और महान योद्धा हैं। दुर्योधन चाहता है कि द्रोणाचार्य उसे इस कठिन स्थिति से निपटने के लिए कोई उपाय बताएं।

श्लोक का विश्लेषण:

  • सञ्जय उवाच (Sanjaya uvāca):
    इसका मतलब है "सञ्जय ने कहा"। यह संवाद की शुरुआत है।

  • दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं (Dṛṣṭvā tu pāṇḍavānīkaṃ):
    "दृष्ट्वा" का अर्थ है "देखकर", और "पाण्डवानीकं" का अर्थ है "पाण्डवों की सेना"। तो दुर्योधन ने पाण्डवों की सेना को देखा।

  • व्यूढं दुर्योधनस्तदा (Vyūḍhaṃ duryodhanastadā):
    "व्यूढं" का अर्थ है "व्यवस्थित रूप में", और "दुर्योधनस्तदा" का अर्थ है "तब दुर्योधन ने"। तो, दुर्योधन ने पाण्डवों की सेना को युद्ध के लिए व्यवस्थित रूप में देखा।

  • आचार्यमुपसंगम्य (Ācāryamupasaṅgamya):
    "आचार्य" का मतलब है "गुरु", और "उपसंगम्य" का मतलब है "पास जाकर"। इसका अर्थ है कि दुर्योधन अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास गया।

  • राजा वचनमब्रवीत् (Rājā vacanamabravīt):
    "राजा" का मतलब है "राजा" (यहां दुर्योधन), और "वचनमब्रवीत्" का मतलब है "इन्होने यह शब्द कहे"। तो, दुर्योधन ने द्रोणाचार्य से यह शब्द कहे।

श्लोक का दर्शन:

यह श्लोक एक महत्वपूर्ण क्षण को दर्शाता है जब दुर्योधन, जो कि एक शक्तिशाली योद्धा है, पाण्डवों की सेना को देख कर घबराता है और समझता है कि युद्ध जीतना आसान नहीं होगा। इसलिए वह द्रोणाचार्य से मार्गदर्शन लेने जाता है।
यह इस बात को दिखाता है कि कभी-कभी, हमें अपने गुरु या बुद्धिमान व्यक्तियों से सलाह लेनी चाहिए, क्योंकि कठिन समय में यह सलाह हमें सही निर्णय लेने में मदद कर सकती है।

कहानी के रूप में:

कल्पना कीजिए, आप युद्ध भूमि पर खड़े हैं। सूरज उग रहा है और सैनिक युद्ध के लिए तैयार हो रहे हैं। दुर्योधन, कौरवों का राजा, अपनी पूरी सेना के साथ खड़ा है। वह पाण्डवों की सेना की ओर देखता है और उनके रणनीतिक युद्ध रूप को देखकर उसे डर लगने लगता है। वह जानता है कि इस युद्ध को जीतना आसान नहीं होगा।

ऐसे में, वह अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाता है। द्रोणाचार्य, जो कि एक महान योद्धा और रणनीतिकार हैं, दुर्योधन के गुरु भी हैं। दुर्योधन उन्हें अपने दिल की बात बताने जाता है और उनसे मार्गदर्शन प्राप्त करने की इच्छा करता है। यह समय दिखाता है कि कभी भी, सबसे शक्तिशाली व्यक्ति को भी चिंता और संदेह हो सकते हैं, और वह मदद के लिए अपने गुरु या सलाहकार से मार्गदर्शन लेता है।

सरल शब्दों में:

दुर्योधन ने पाण्डवों की सेना को देखा और महसूस किया कि युद्ध जीतना इतना आसान नहीं होगा। उसने तुरंत अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर उनसे सलाह ली। यह दिखाता है कि कठिन समय में हमें भी कभी-कभी मदद की ज़रूरत होती है, और हमें अपने शिक्षकों या गुरु से मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए।

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